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वट सावित्री कथा: पत्नीव्रता का अनूठा उदाहरण

Vat Savitri Katha: A unique example of loyalty to a wife

Vat Savitri कथा हिंदू धर्म में पत्नीव्रता और सतीत्व का प्रतीक मानी जाती है। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्यार और दृढ़ विश्वास किन परिस्थितियों में भी विफल नहीं होता। आइए जानते हैं वट सावitri कथा को विस्तार से

कथा Vat

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा अश्वपति की एक पुत्री थीं, सावित्री। सावित्री सत्यनिष्ठा, पतिव्रता और बुद्धिमान स्त्री थीं। उनकी शादी सत्यवान नाम के एक गरीब राजकुमार से हुई, जिनके बारे में भविष्यवाणी थी कि वह विवाह के तीन दिन बाद ही मृत्यु को प्राप्त होंगे।

विवाह के तीन दिन बाद, भविष्यवाणी सच साबित हुई। यमदूत सत्यवान की आत्मा को लेने आए। सावित्री अपने पति के शव के साथ चल पड़ीं। यमराज ने सावित्री की दृढ़ता और पतिभक्ति देखकर उन्हें तीन वरदान दिए। सावित्री ने पहला वर अपने ससुराल की खुशहाली के लिए, दूसरा अपने सास-ससुर के नेत्र ज्योति के लिए मांगा।

तीसरे वर में सावित्री ने संतान प्राप्ति की इच्छा जताई। यमराज चकित हुए क्योंकि संतान प्राप्ति के लिए पति का होना जरूरी था। सावित्री ने समझाया कि संतान ही माता-पिता का असली सुख होता है। उनकी बुद्धि और तर्क से प्रभावित होकर यमराज ने सत्यवान की आत्मा को वापस लौटा दिया। इस तरह सावित्री अपने पति को यमराज के चंगुल से वापस ले आईं

वट पूजा का महत्व (Significance of Vat Puja)

वट सावित्री कथा के उपलक्ष्य में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वट वृक्ष को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान, महिलाएं पेड़ के चारों ओर धागा बांधती हैं और अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं

कथा का सार (The Moral of the Story)

वट सावित्री कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्यार और दृढ़ विश्वास हर मुश्किल को पार कर सकता है। यह कथा पत्नी व्रत और सतीत्व के महत्व को भी रेखांकित करती है

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