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> वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi): आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का पर्व

वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi): आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का पर्व

वरूथिनी एकादशी: आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का पर्व
वरूथिनी एकादशी: आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का पर्व
वरूथिनी एकादशी: आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का पर्व

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व होता है, और वैशाख माह (Vaishākh Mah) में पड़ने वाली वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) का महत्व और भी बढ़ जाता है। आइए इस वर्ष 4 मई को पड़ने वाली वरूथिनी एकादशी के बारे में कुछ अनूठी बातें जानें:

महत्व (Importance):

  • आध्यात्मिक उन्नति (Adhyāत्मik Unnati): वरूथिनी एकादशी व्रत रखने और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा करने से आध्यात्मिक विकास होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • मनोकामना पूर्ति (Manokamna Poorti): ऐसा माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गईं प्रार्थनाएं स्वीकार होती हैं और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
  • पारिवारिक सुख-शांति (Parivarik Sukh-Shanti): वरूथिनी एकादशी के व्रत से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पारिवारिक क्लेश दूर होकर सुख-शांति का वास होता है।

पूजा विधि (Puja Vidhi):

  1. व्रत संकल्प (Vrat Sankalp): एकादशी तिथि के प्रारंभ होने से पहले ही व्रत का संकल्प लें। शुद्ध जल पीकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत को पूर्ण करने का संकल्प लें।
  2. स्नान और पूजा की तैयारी (Snan aur Puja ki Taiyari): एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान की साफ-सफाई करें और चौकी पर चौकोर आसन बिछाएं।
  3. आसन और मूर्ति स्थापना (Aasan aur Murti Sthapana): आसन पर गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें और फिर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें।
  4. षोडशोपचार पूजन (Shodashopachara Pujan): भगवान विष्णु को विधिवत स्नान कराएं और उन्हें वस्त्र एवं आभूषण अर्पित करें। इसके बाद तुलसी दल, चंदन, फल, फूल और मिठाई का भोग लगाएं। धूप, दीप और आरती से पूजा का समापन करें।
  5. व्रत का पालन (Vrat ka Palan): पूरे दिन सात्विक भोजन करें और अनाज का सेवन न करें। रात्रि में भी जागरण करके भजन-कीर्तन कर सकते हैं।

कथा (Katha):

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि मेधा (Maharshi Medha) माता शक्ति (Mata Shakti) के क्रोध से बचने के लिए अपने शरीर का त्याग कर देते हैं। उनका शरीर का एक अंश धरती माता (Dharti Mata) के गर्भ में समा जाता है। माना जाता है कि जिस दिन यह घटना घटी, वह वरूथिनी एकादशी का दिन था। बाद में महर्षि मेधा चावल और जौ के रूप में पृथ्वी पर पुनर्जन्म लेते हैं। यही कारण है कि इस दिन चावल और जौ का सेवन वर्जित माना जाता है।

वरूथिनी एकादशी के इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाकर आप न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं बल्कि अपने मनोवांछित फलों को भी प्राप्त कर सकते हैं।

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