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राजकोट के बाद दिल्ली: गेम जोन की आग बुझी नहीं कि चपेट में अस्पताल

After Rajkot, Delhi: Fire in Game Zone not extinguished or hospital in trouble

लापरवाही की आग में 7 मासूम राख
लोगों ने बढ़ाए हाथ, बचाईं जानें

लापरवाही की आग एक बार फिर हमारे नौनिहालों को लील गई। गुजरात के राजकोट में टीआरपी गेम जोन में लगी आग की लपटें ठीक से बुझी भी नहीं थी कि शनिवार को देर रात दिल्ली के बेबी केयर न्यू बॉर्न अस्पताल में आग लगने से सात शिशु अकाल मौत के मुंह में समा गए। पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार इलाके के अस्पताल में लगी आग से झुलसे पांच अन्य का इलाज चल रहा है, जिनमें एक की हालत नाजुक है। हालांकि 12 शिशुओं को बचा लिया गया। आग इतनी भयानक थी कि दमकल की 16 गाडियों को काबू पाने में चार घंटे का समय लगा।

अधिकारियों ने आग लगने के कारणों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन कहा जा रहा है कि कई ऑक्सीजन सिलेंडरों में विस्फोट होने की वजह से आग लगी थी। इस दौरान भूतल पर रखे ऑक्सीजन सिलेडर एक-एक कर फटने लगे। इससे मौके पर अफरा-तफरी और भगदड़ मच गई। पुलिस का कहना है कि सात से आठ सिलेडर फटे, जिनका मलबा 150 मीटर दूर आइटीआइ तक पहुंचा। पुलिस के अनुसार, हादसे का शिकार हुए सात में से एक बच्चे की मौत शनिवार शाम खुद ही हो गई थी।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराज्यपाल वीके सक्सेना, सीएम अरविंद केजरीवाल और स्वास्थ्य मंत्री सौरभ भारद्वाज ने हादसे पर दुख जाहिर किया है।

एलजी और स्वास्थ्य मंत्री ने हादसे की जांच के आदेश देकर दोषियों को सजा दिलवाले की बात की है। रविवार को पोस्टमार्टम के बाद सभी मासूमों के शव उनके परिजनों सौंप दिए गए हैं। क्राइम टीम के अलावा एफएसएल, बीएसईएस और दमकल विभाग की टीम ने अस्पताल परिसर का मुआयना किया है।

ऑक्सीजन की अवैध रिफिलिंग :
पड़ोसियों का दावा है कि अस्पताल के भूतल पर अवैध रूप से ऑक्सीजन के छोटे सिलेडरों की रिफिलिंग की जा रही थी। यहीं से आग लगी जो अस्पताल तक पहुंच गई। आग ने अस्पताल के अलावा पड़ोस की दो अन्य इमारतों को भी चपेट में ले लिया। आग से पड़ोसी की बुटीक, एक चश्मे की दुकान, इंडसइंड बैंक का कुछ हिस्सा व पड़ोस की इमारत की पहली और दूसरी मंजिल भी जल गई। शुरुआती जांच के दौरान कुछ लोगों ने अस्पताल की पहली मंजिल पर बनी रसोई से आग लगने की बात कही है। कुछ पड़ोसियों ने अस्पताल के ठीक सामने लगे बीएसईएस के खंभों से आग लगने की भी आशंका जाहिर की है। पुलिस सही वजहों का पता लगाने का प्रयास कर रही है।

मालिक और संचालक गिरफ्तार :
हादसे के बाद अस्पताल के मालिक डॉक्टर नवीन कीची और बेबी केयर सेंटर के संचालक डॉक्टर नवीन को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस उनसे पूछताछ कर रही है। फोरेंसिक टीम मामले की छानबीन कर रही है।

बेबी केयर न्यू बॉर्न अस्पताल में लगी आग के बाद बच्चों को बाहर निकालते फायर ब्रिगेड कर्मी और लोग।

मानव निर्मित आपदा, कैसे दी मंजूरी: हाईकोर्ट
मोर्चरी के बाहर हृदय विदारक दृश्य

राजकोट के टीआरपी गेम जोन अग्निकांड में गुजरात हाई कोर्ट ने अवकाश होने के बावजूद मामले पर स्वत: संज्ञान लिया है। जस्टिस बीरेन वैष्णव और जस्टिस देवन देसाई ने साफ कहा कि यह आपदा मानव जनित है, सरकार बताए कि वह किन नियमों के तहत इन्हें उपयोग की मंजूरी दे रही है। हाई कोर्ट ने राजकोट सहित अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत महानगर पालिका और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर सोमवार को अपना जवाब पेश करने को कहा है। गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने इसे जनहित याचिका के तौर पर लेने की गुहार लगाई थी। इस बीच, हादसे में मृतकों की संख्या 32 हो गई है। राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआइटी गठित कर तीन दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।

राजभा घर का रतन, इन्होंने लील लिया
में एक ही परिवार के पांच लोग लापता हैं जिनमें चार की उम्र 10-12 साल है। पौत्र राजभा व अन्य परिजनों की तलाश कर रहे विरेन्द्र सिंह ने कहा कि राजभा हमारे घर का रतन था। इन लोगों ने उसे लील लिया। परिवार के 8 सदस्य गेम जोन में गए थे। तीन का पता चल गया है पांच लापता हैं। इसमें राजभा भी शामिल है।

‘एक दिन का था…उसकी मां को क्या बताऊंगा…’
गुरु तेग बहादुर अस्पताल में एक पत्थर पर भाव शून्य बैठे विनोद शर्मा का नवजात अंदर शवगृह में बैग में बेजान पड़ा है। एक दिन पहले ही शर्मा परिवार ने उसके जन्म का जश्न मनाया था। बेबी केयर न्यू बोर्न अस्पताल में मरने वाले सात शिशुओं में यह सबसे छोटा था। दो बच्चों की असमय मौत के बाद उसका जन्म हुआ था। शर्मा ने कहा, ’हम बहुत खुश थे क्योंकि इस बार उम्मीद थी कि बच्चा बच जाएगा। उसे सांस लेने में दिक्कत थी। डॉक्टर ने कहा था कि कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा।… हमें नहीं पता था कि अस्पताल उसे मार देगा।’ गुरु तेग बहादुर अस्पताल के शवगृह के पास रविवार को भीड़ थी। दो पुलिसकर्मी कुछ लोगों के बयान दर्ज कर रहे थे। वे उन बच्चों के पिता, चाचा, दादा और पड़ोसी थे जो आग में मारे गए थे।

अस्पताल की रजिस्ट्री में शिशुओं की पहचान केवल उनकी माताओं के नाम से थी। अधिकांश माताओं को तब तक आग के बारे में पता नहीं था। परिवारों ने नहीं बताया क्योंकि ’बताने के लिए कोई शब्द नहीं है।’ शर्मा ने कहा, ’मैं अपनी पत्नी को क्या बताऊंगा? वह दर्द बर्दाश्त नहीं कर पाएगी।’

अस्पताल में बेचैन खड़े अमित ने बताया कि जब सुबह भाई घर से अस्पताल जाने के लिए निकले तो उन्होंने फोन किया। उन्हें पता चला कि बच्चों को पहले ही जीटीबी अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है। अमित ने बताया, कि हमें उम्मीद थी कि हमारा बच्चा जिंदा होगा। जब हम अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने हमें शवगृह जाने को कहा।

बासठ साल की शहनाज़ खातून दिल्ली के भजनपुरा से आई थीं। उनकी आंखें सूजी हुई थीं। उनका पोता पांच दिन का था। कहने लगीं ’हमें उम्मीद थी कि उसे दो दिन में छुट्टी मिल जाएगी। हमें नहीं पता था कि हम उसका शव घर ले जाएंगे।

उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल पवन कसाना ने बताया कि उनका पहला बच्चा था। डॉक्टर ने बताया कि उसे पेट में संक्रमण है। उसे कुछ दिनों तक देखभाल की ज़रूरत है। वह पिछले छह दिनों से अस्पताल में था। जब वह अपने नवजात को लेकर आए थे, तो डॉक्टर ने कहा था कि सब ठीक हो जाएगा।

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